आज बचपन की कुछ बातें करते हैं
मेरी याददाश्त खराब है
. जिया हुआ नब्बे फीसद भूल गया हूँ .आने वाली नब्बे फीसद घटनाएं याद हैं,
लेकिन बचपन की कुछ
यादें अमिट हैं .
मैं जब बच्चा था , यानी दस-एक साल की उमर तक , तब मैं सबसे ज़्यादा यही सोचता था
कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं एक ऐसा समाज बनाऊँगा , जो बच्चों के लिए होगा .
मुझे लगता था कि ये
कैसा समाज है , जिसमें
बच्चों की कोई कदर ही नहीं है . मतलब बच्चों की भावनाओं को समझने की जरूरत तक नहीं
समझी जाती . बड़े बिना बच्चों से पूछे ही तय कर लेते हैं कि बच्चे क्या चाहते हैं.
वे अपनी इच्छाओं, कुंठाओं
और सनकों को मासूम बच्चों पर थोपते हिचकते तक नहीं है .
यह तानाशाही , यह दमन , यह अंधायुग नहीं चलेगा . दुनिया
बच्चों की , बच्चों
के लिए और बच्चों के द्वारा होनी चाहिए . और बच्चे तो बच्चे होते हैं . वे जब
दुनिया बनाएंगे तो इंसाफ करेंगे . उसमें बड़ों के लिए भी बड़ी जगह होगी .
मैंने ढेर सारी योजनाएं
बनाई थीं कि इस सपने को कैसे अंजाम दिया जाएगा . लेकिन अफ़सोस , जैसे जैसे बड़ा होता गया, उन सब को बारीबारी भूलता चला गया , बच्चों के दमन-उत्पीड़न में भी
औरों की तरह ही शरीक होता चला गया .
मैं भले ही भूल गया , लेकिन मेरे बचपन के देखे कुछ सपने
, बिना
मेरी किसी कोशिश के सच हो गए .
चौहत्तर -पचहत्तर का समय था , जब हमारे घर में पहली बार रेडियो
आया . हमारे जीवन का आठवां सावन होगा . बीबीसी सुनने का दौरथा . आपातकाल के ज़माने
में बीबीसी सुनने के रोमांच को उस दौर के लोग कभी भूल नहीं पाएँगे .
मैं दिनरात रेडियो
सुनता , और
दुनिया जहान के स्टेशन खोजता . जर्मनी , इटली , जापान , नेपाल , अमरीका तक की सैर करता . और सोचता
, काश
एक ऐसा रेडियो होता , जिसमें
चलती -फिरती तस्वीरें भी देखी जा सकतीं .
उस समय तक टीवी की खोज
तो हो चुकी थी, लेकिन
वह हमारी जानकारी का क्या , कल्पना
तक का हिस्सा नहीं था. खैर , चार एक साल बाद जब पहली बार वह
श्वेत श्याम टीवी दिखा , मैं
सोचता ही रह गया कि यार लोगों को मेरे उस सपने के बारे में कैसे पता चला!
लेकिन सपनों की कोई सीमा थोड़े ही
थी.
एक यह कि कलाई पर
बाँधने के लिए एक ऐसी घड़ी हो , जिसमें समय ही नहीं , दुनिया का सारा इतिहास-भूगोल देखा
जा सके . असल में , बालमन
में सवालों का कोई अंत तो होता नहीं . सौभाग्य से , मेरे मातापिता मेरे सवालों पर
नाराज़ न होते , लेकिन
हर सवाल का जवाब तो उनके पास नहीं होता . उनके क्या , चाचाओं , दादाओं, पड़ोसियों , गुरुजनों के पास भी नहीं होता .
कितना मज़ा आता , अगर
कलाई पर बंधी घड़ी में झाँक कर हर सवाल का जवाब पाया जा सकता .
अब सुना है , ऐसी घड़ी भी बन गई है . उसे
सेब-घड़ी कहते हैं . मैंने देखी नहीं है . आपने देखी हो तो बताइयेगा .
आहा, हा . मगर मेरा मनपसंद बचपना तो
कुछ और ही था.
वह यह था . तकिए में सर
गड़ा कर पेट के बल लेट जाना . और फिर यह सोचना कि लेटा नहीं हूँ , किसी उड़नखटोले पर सवार हूँ . जी , बाकायदा एक छह गुने आठ का ललछौंह
उड़नखटोला . वह ठीक मेरे बिस्तर से उठता . घर की छत से निकलता.मुहल्ले से गुजरता .
शहर की अनदेखी जगहें पार करता . औरउसके बाद ....
ओह , क्या बताऊँ , कहाँ कहाँ उड़ता चला जाता. उसके
साथ मैं भी , सिंदबाद
की तरह .
अब सुनते हैं , एक ऐसा चश्मा बन गया है . आभासी
यथार्थ दिखाने वाला चश्मा . मगर वह उड़नखटोला अब भी नहीं बना.
लेकिन सुनते हैं , लोग लगे हुए हैं, ठीक ऐसा एक उड़नखटोला बनाने में .
जो भी हो , बचपन के ये सपने खो नहीं जाने
चाहिए .
आशुतोष कुमार
समालोचक और
संस्कृतिकर्मी
प्रोफेसर, दिल्ली
विश्वविद्यालय