बच्चों की तरफ़ से यह
कविता जुलाई 2015 में एक मित्र के आग्रह पर उनके बेटे के लिए स्कूल में सुनाने के
लिए लिखी थी। आज Earth
Day-2016 (पृथ्वी दिवस)
के मौके पर अचानक याद आ गई। याद इसलिए भी आई कि आज देश के कई राज्यों में सूखे के
हालात हैं और पानी की बर्बादी रोकने के लिए सामाजिक संगठनों से लेकर कोर्ट तक
सक्रिय है। लेकिन सरकारें लापरवाह दिख रही हैं। पेड़ों को बचाना, पानी को बचाना
दरअस्ल अपनी धरती को बचाना है। तो आइए इस मुहिम में हम भी जुड़ें।– मुकुल सरल
धरती को बचाना है
बादल क्यों बरसे हैं कम-कम
धरती को क्या दुख है, क्या ग़म
हरियाली क्यों सूख रही है
कब समझेंगे हम-तुम, तुम-हम
मम्मी आओ, पापा आओ
पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ
पेड़ों से है अपना जीवन
हाथ जोड़कर कहते हैं हम
बादल क्यों बरसें हैं कम-कम
धरती को क्या दुख है, क्या ग़म...
मुकुल सरल


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