शनिवार, 23 अप्रैल 2016

सबसे छोटी रामायण!


दोस्तो, आपने कहानी और उपन्यास तो ख़ूब पढ़े होंगे। लघुकथाएं भी ख़ूब लिखी-पढ़ी गई हैं। लेकिन लघुकथा में भी अतिलघु कथा यानी एक-दो लाइन की कहानी आपने पढ़ी है! और यह नन्ही कहानी भी ऐसी जिसमें कहानी के सभी तत्व हों। यानी जो एक कहानी होने की सभी शर्तें पूरी करती हो।
वरिष्ठ साथी और हिन्दी के प्रख्यात आलोचक आशुतोष कुमार ने पिछले दिनों एक सबसे छोटी कहानी सुनाई-

भूतों की कहानियां पढ़ रहे सहयात्री से मैंने पूछा -क्या आप भूत -प्रेत मानते हैं ? उस ने मुस्कुराते हुए कहा -नहीं. और गायब हो गया.

आशुतोष जी के अनुसार- कहते हैं यह दुनिया की सब से छोटी कहानी है . इस में कहानी के सभी तत्व मौजूद हैं. कथानक , चरित्र, कौतूहल , वर्णन , संवाद, चरमोत्कर्ष. क्या यह एक सफल मुकम्मल कहानी है ?
उन्होंने यह कहानी सुनाई तो हमें भी एक छोटी कहानी याद आई जो हमें बेहद शानदार और धारदार लगती है। लेखक का नाम मालूम नहीं है। कहानी कुछ यूं है-

एक आदमी राजा बना। आदमी तो मर गया। राजा राज करता रहा।

इसी तरह कुछ और छोटी कहानियां याद आईं। फिर याद आई सबसे छोटी रामायण, जो हमें मां बचपन में सुनाया करती थी और हम आज भी उसे अपने बच्चों के सामने यूं ही दोहरा लिया करते हैं- सुनिए यह सबसे छोटी लोक रामायण-

एक छत्री एक बामन्ना
वा ने वा की नार चुराई
वा ने वा पर करी चढ़ाई
ये है एक रामन्ना
ये है एक पोथन्ना


{छत्री- क्षत्रीय (रामजी)। बामन्ना- ब्राह्मण (रावण)। नार- स्त्री (सीताजी)। रामन्ना- रामायण। पोथन्ना- ग्रंथ}

-मुकुल सरल

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

धरती को बचाना है



बच्चों की तरफ़ से यह कविता जुलाई 2015 में एक मित्र के आग्रह पर उनके बेटे के लिए स्कूल में सुनाने के लिए लिखी थी। आज Earth Day-2016 (पृथ्वी दिवस) के मौके पर अचानक याद आ गई। याद इसलिए भी आई कि आज देश के कई राज्यों में सूखे के हालात हैं और पानी की बर्बादी रोकने के लिए सामाजिक संगठनों से लेकर कोर्ट तक सक्रिय है। लेकिन सरकारें लापरवाह दिख रही हैं। पेड़ों को बचाना, पानी को बचाना दरअस्ल अपनी धरती को बचाना है। तो आइए इस मुहिम में हम भी जुड़ें।– मुकुल सरल




धरती को बचाना है

बादल क्यों बरसे हैं कम-कम
धरती को क्या दुख है, क्या ग़म
हरियाली क्यों सूख रही है
कब समझेंगे हम-तुम, तुम-हम

मम्मी आओ, पापा आओ
पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ
पेड़ों से है अपना जीवन
हाथ जोड़कर कहते हैं हम

बादल क्यों बरसें हैं कम-कम
धरती को क्या दुख है, क्या ग़म...

मुकुल सरल

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

बचपन की बातें



आज बचपन की कुछ बातें करते हैं 

मेरी याददाश्त खराब है . जिया हुआ नब्बे फीसद भूल गया हूँ .आने वाली नब्बे फीसद घटनाएं याद हैं,
लेकिन बचपन की कुछ यादें अमिट हैं . 
मैं जब बच्चा था , यानी दस-एक साल की उमर तक , तब मैं सबसे ज़्यादा यही सोचता था कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं एक ऐसा समाज बनाऊँगा , जो बच्चों के लिए होगा . 
मुझे लगता था कि ये कैसा समाज है , जिसमें बच्चों की कोई कदर ही नहीं है . मतलब बच्चों की भावनाओं को समझने की जरूरत तक नहीं समझी जाती . बड़े बिना बच्चों से पूछे ही तय कर लेते हैं कि बच्चे क्या चाहते हैं. वे अपनी इच्छाओं, कुंठाओं और सनकों को मासूम बच्चों पर थोपते हिचकते तक नहीं है . 
यह तानाशाही , यह दमन , यह अंधायुग नहीं चलेगा . दुनिया बच्चों की , बच्चों के लिए और बच्चों के द्वारा होनी चाहिए . और बच्चे तो बच्चे होते हैं . वे जब दुनिया बनाएंगे तो इंसाफ करेंगे . उसमें बड़ों के लिए भी बड़ी जगह होगी .
मैंने ढेर सारी योजनाएं बनाई थीं कि इस सपने को कैसे अंजाम दिया जाएगा . लेकिन अफ़सोस , जैसे जैसे बड़ा होता गया, उन सब को बारीबारी भूलता चला गया , बच्चों के दमन-उत्पीड़न में भी औरों की तरह ही शरीक होता चला गया .
मैं भले ही भूल गया , लेकिन मेरे बचपन के देखे कुछ सपने , बिना मेरी किसी कोशिश के सच हो गए .
चौहत्तर -पचहत्तर का समय था , जब हमारे घर में पहली बार रेडियो आया . हमारे जीवन का आठवां सावन होगा . बीबीसी सुनने का दौरथा . आपातकाल के ज़माने में बीबीसी सुनने के रोमांच को उस दौर के लोग कभी भूल नहीं पाएँगे . 
मैं दिनरात रेडियो सुनता , और दुनिया जहान के स्टेशन खोजता . जर्मनी , इटली , जापान , नेपाल , अमरीका तक की सैर करता . और सोचता , काश एक ऐसा रेडियो होता , जिसमें चलती -फिरती तस्वीरें भी देखी जा सकतीं . 
उस समय तक टीवी की खोज तो हो चुकी थी, लेकिन वह हमारी जानकारी का क्या , कल्पना तक का हिस्सा नहीं था. खैर , चार एक साल बाद जब पहली बार वह श्वेत श्याम टीवी दिखा , मैं सोचता ही रह गया कि यार लोगों को मेरे उस सपने के बारे में कैसे पता चला!
लेकिन सपनों की कोई सीमा थोड़े ही थी.
एक यह कि कलाई पर बाँधने के लिए एक ऐसी घड़ी हो , जिसमें समय ही नहीं , दुनिया का सारा इतिहास-भूगोल देखा जा सके . असल में , बालमन में सवालों का कोई अंत तो होता नहीं . सौभाग्य से , मेरे मातापिता मेरे सवालों पर नाराज़ न होते , लेकिन हर सवाल का जवाब तो उनके पास नहीं होता . उनके क्या , चाचाओं , दादाओं, पड़ोसियों , गुरुजनों के पास भी नहीं होता . कितना मज़ा आता , अगर कलाई पर बंधी घड़ी में झाँक कर हर सवाल का जवाब पाया जा सकता . 
अब सुना है , ऐसी घड़ी भी बन गई है . उसे सेब-घड़ी कहते हैं . मैंने देखी नहीं है . आपने देखी हो तो बताइयेगा .
आहा, हा . मगर मेरा मनपसंद बचपना तो कुछ और ही था.
वह यह था . तकिए में सर गड़ा कर पेट के बल लेट जाना . और फिर यह सोचना कि लेटा नहीं हूँ , किसी उड़नखटोले पर सवार हूँ . जी , बाकायदा एक छह गुने आठ का ललछौंह उड़नखटोला . वह ठीक मेरे बिस्तर से उठता . घर की छत से निकलता.मुहल्ले से गुजरता . शहर की अनदेखी जगहें पार करता . औरउसके बाद ....
ओह , क्या बताऊँ , कहाँ कहाँ उड़ता चला जाता. उसके साथ मैं भी , सिंदबाद की तरह . 
अब सुनते हैं , एक ऐसा चश्मा बन गया है . आभासी यथार्थ दिखाने वाला चश्मा . मगर वह उड़नखटोला अब भी नहीं बना. 
लेकिन सुनते हैं , लोग लगे हुए हैं, ठीक ऐसा एक उड़नखटोला बनाने में .
जो भी हो , बचपन के ये सपने खो नहीं जाने चाहिए . 

आशुतोष कुमार
समालोचक और संस्कृतिकर्मी
प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय


गुरुवार, 31 मार्च 2016

बच्चों के लिए सिनेमा CHILDREN’S FILM FESTIVAL


INVITATION : CHILDREN’S FILM FESTIVAL

Founded in 1976, Action India has reached its 40th year of working with urban low income families in and around Delhi. Building resurgent communities we have sustained our connection with the women, children and youth over these long years moving over three generations. With the passage from discovering childhood to growing adolescence, empowering woman’s voice and agency, we recognize the needs of the elderly and people with special needs.

Celebrating the 40th year on March 6th, 2016, all members of the organization gathered to share the warmth and caring of our fraternity. The long struggle of courage and hope against all odds for the survival of our values and mission committed to social change. In a rapidly changing development scenario, we aim to enable all citizens to participate and claim their share of the economic growth, knowledge and technological advancement from the bottom up.

We believe there is a place and space for everyone and respect for all religions and allow no discrimination of caste or occupation.

In collaboration with the Children’s  Film  Society of India, our first major event of the 40th year celebration will bring together 1000 children from the urban community aged 8-16 years to the Children’s Film Festival on 1 and 2 April 2016 at Bal Bhawan, Delhi.

We request your support and participation in this festival to provide refreshments (contribution), gifts, prizes, etc. or play games and organize activities for children in groups.

Thanking you
With best wishes
Gouri Choudhury
Chairperson

बुधवार, 30 मार्च 2016

हुर्रे... मैंने खोज ली है टाइम मशीन

टाइम मशीन की खोज
ड्रॉइंग : सखी, कक्षा-7
आओ, चलें समय के आर-पार
-   मुकुल सरल

बच्चो, मैंने टाइम मशीन ईजाद कर ली है, या कहूँ कि खोज ली है। चौंक गए न...! जी हाँ, टाइम मशीन जिसके जरिये समय के आर-पार जाया जा सकता है। भूत में भी, भविष्य में भी। टाइम मशीन हमारे नए समय की एक लोकप्रिय अवधारणा है, हमारे टी.वी. कार्टून्स से लेकर हॉलीवुड फिल्मों तक। हम जादुई चिराग़ के सपने देखा करते थे और हमारे बच्चे टाइम मशीन के सपने देखते हैं। मेरे बच्चे भी अक्सर ऐसे कार्टून और फिल्में देखते हुए कहते हैं कि काश! हमारे पास भी टाइम मशीन होती तो हम भी किसी भी समय में चले जाते। वे मुझसे भी अक्सर पूछते हैं कि पापा क्या सच्ची में टाइम मशीन बनाई जा सकती है? मुझे भी उनका टाइम मशीन का विचार बेहद रोमांचित करता है। इसी तरह देखते-सोचते मुझे ख़्याल आया कि अरे हमारे पास तो टाइम मशीन पहले से ही मौजूद है! और एक नहीं, कई-कई। आप हँसेंगे पर ये सच है।
हमारी टाइम मशीन हैं : हमारी किताबें, हमारे अख़बार, हमारी तस्वीरें, हमारे ऑडियो/वीडियो, हमारी फिल्में। इन सबके जरिये हम देश-काल-समय के आर-पार आ-जा सकते हैं। वर्तमान के साथ भूतकाल भी देख सकते हैं और भविष्य का भी जायजा ले सकते हैं। अपनी किताबों जिनमें इतिहास भी है, भूगोल भी और साहित्य और विज्ञान भी उनके जरिये ही हमने जाना कि करोड़ों साल पहले हमारी धरती और आकाश-गंगा कैसे बनी। कैसे मनुष्य अस्तित्व में आया। 
इन्हीं किताबों ने हमें बताया कि पाषाण युग कैसा था। आदि मानव कैसे जीता था। उसका भोजन क्या था, कपड़े क्या थे, औज़ार क्या थे। इन सबका पूरा ब्योरा हमें अपनी किताबों में मिलता है। फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति और भारत का स्वतंत्रता संग्राम कैसे लड़ा और जीता गया, इन्हीं किताबों के जरिये हम जानते हैं। यही किताबें बुद्ध और ईसा का काल बताती हैं। सम्राट अशोक और अकबर के शासन का ब्योरा देती हैं। महात्मा गांधी ने क्या कहा, डॉक्टर आंबेडकर ने क्या किया, झांसी की रानी कैसी दिखतीं थी और भगत सिंह के क्या विचार थे। ये सब किताबों के माध्यम से ही नयी पीढ़ी के पास पहुंचा।
इन्हीं किताबों से हमें झलक मिलती है कि हमारा भविष्य कैसा होगा। यही नीतियां जारी रहीं तो पचास या सौ साल बाद देश और दुनिया की तस्वीर कैसी होगी।
इन्हीं किताबों जिनमें कविता भी शामिल है, कहानी भी और इसी तरह हमारे नए-पुराने अख़बार भी इन सबके जरिये हमने जाना कि हमारा समाज कैसा था, उसकी क्या भावनाएं, सपने और आकांक्षाएं थी। शोषण के स्वरूप और समाज को तोड़ने और जोड़ने वाले तत्वों को हमने इन्हीं माध्यमों से जाना-पहचाना। हमने जाना कि हमारे परिवार और समाज में किस तरह के बदलाव आए और आगे क्या बदलाव आने वाले हैं। इन किताबों और अख़बारों के जरिये भविष्य की संभावनाओं का एक पूरा खाका हमारे पास है। 
हमारी तस्वीरें भी एक टाइम मशीन हैं। इनके जरिये हम अपने अतीत में झांक सकते हैं। हम एक तस्वीर देखते समय अपने बचपन में चले जाते हैं। मैं अभी एक तस्वीर देख रहा था जिसमें मेरी बेटी घुटनों के बल चल रही है, मैं तुरंत दस साल पुराने उस समय में चला गया जब बेटी चलना सीख रही थी। अपने मां-पिता की एक तस्वीर देखते समय मैं अपना भविष्य देख रहा था। कैमरे के अलावा कलाकारों ने अपनी कलम-कूची के जरिये भूत, वर्तमान और भविष्य तक की तस्वीरें बनाईं हैं। आप बीस साल बाद कैसे दिखेंगे आजकल कंप्यूटर और कलाकार ऐसी भी तस्वीर बनाकर आपको दे सकते हैं। 
हमारे वीडियो जिसमें हमारे घरेलू वीडियो से लेकर न्यूज़ वीडियो और फिल्में भी शामिल हैं ये तो बाकायदा टाइम मशीन ही हैं। इनमें हमारा आज-कल बिल्कुल जीवंत रूप में हमारे सामने होता है। चलते-फिरते, हँसते-बोलते। बिल्कुल हमारी आँखों के सामने। मेरे भतीजे को अपने पापा-मम्मी की शादी का वीडियो देखने का बहुत शौक है। वो उसे जब भी चलाता है तो पुराना समय पर्दे पर साकार हो जाता है। देश की आज़ादी के समय 14 अगस्त, 1947 की आधी रात को हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का संविधान परिषद के सामने दिया गया ऐतिहासिक भाषण तो आप भी हर स्वतंत्रता दिवस पर टीवी पर देखते-सुनते होंगे। आज यू-ट्यूब पर ऐसे कई ऐतिहासिक क्षणों के वीडियो मिल जाएंगे। आजकल तो हमारा सोशल मीडिया खासतौर पर फेसबुक भी हमारे गुज़रे लम्हों को फिर हमारे बीच साझा कर देता है। 
हमारी फिल्मों ने तो हमारे भूत, वर्तमान के समय-समाज को बखूबी दर्ज किया है। मनोरंजक और कला फिल्मों सहित डॉक्यूमेट्री और साइंस फिक्शन सरीखी फिल्मों ने हमारे भूत और वर्तमान के साथ-साथ हमारे भविष्य की रूप-रेखा भी भली-भांति हमारे सामने खींच दी। तो दोस्तो इतनी तरह की टाइम मशीन हमारे सामने हैं। और इसके अलावा हमारे मां-बाप, हमारे दादा-दादी, नाना-नानी और आप बच्चे तो हमारी जीती-जागती टाइम मशीन हैं। मां-बाप के जरिये हम अपने बीते हुए कल और आज को जान सकते हैं तो अपने बच्चों की आंखों में अपना भविष्य देख सकते हैं। बस सबके साथ थोड़ा समय बिताने की ज़रूरत है। साथ बैठकर बतियाने की ज़रूरत है। तो दोस्तो, बताइए मिल गई न टाइम मशीन। फिर देखिए, जाँचिए, परखिए मेरी बातों को और मज़े के साथ समय के आर-पार आवाजाही कीजिए।

-    ई-मेल- mukulsaral@gmail.com

सोमवार, 28 मार्च 2016

विज्ञान के 'चमत्कार'

बच्चो, आप दिल्ली के राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र (National Science Center) गए हैं। अगर नहीं, तो एक बार ज़रूर जाएं। यहां आपको विज्ञान के चमत्कार देखने को मिलेंगे।


National Science Center दिल्ली में प्रगति मैदान के गेट नं.-1 के पास भैरो रोड पर है।
आठ मंज़िल वाले इस संग्रहालय में वर्किंग साइंस संबंधी प्रदर्शनी के साथ ही साथ स्थापत्यकला के इतिहास को भी प्रदर्शित किया गया है।  यहां सभी आयु वर्गों के लिए विभिन्न खण्ड जैसे हैरिटेज और डायनासोर गैलरी, मानव जीवविज्ञान गैलरी, फन साइंस लाइब्रेरी आदि हैं। भौतिकी के सिद्धांतों की व्याख्या करने वाले अनेक हैंड्स-ऑन डिस्पले भी हैं। इस संग्रहालय का साइबरकूल देश का पहला मनोरंजन आधारित मल्टीमीडिया सेंटर है।  बच्चो, इस संग्रहालय को देखने के लिए कम से कम एक पूरा दिन चाहिए।
Constructed in 8 floors, this museum houses working science exhibition as well as exhibits on the history of architecture. It has various sections for all age groups such as Heritage & Dinosaur gallery, Human Biology gallery, Fun Science Library etc. There are also a number of hands-on displays explaining the laws of physics.
तो हो जाइए तैयार Fun के साथ Science को जानने के लिए। 

- मुकुल सरल 


सुन मेरे बच्चे

                फोटो : मुकुल सरल

बेटे को


सुनो बेटे
बड़े-बड़े शब्दों से कभी घबराना मत
बहुत बड़ा शब्द
बहुत छोटी-सी चीज़ का नाम होता है।

और जो सचमुच विशाल हैं, बड़े हैं
उनके नाम छोटे-छोटे होते हैं :
जैसे जीवन, मृत्यु, युद्ध, शांति,
आशा, प्रेम, घर, रात, दिन।

छोटे-छोटे शब्दों का कैसे
बड़े रूप में, सुंदर ढंग से
इस्तेमाल करोगे, वह सीख लो
यह है बहुत मुश्किल पर तुम
जो कुछ कहना चाहोगे
बख़ूबी कह सकोगे।

जब तुम क्या कहना चाहते हो
तुम्हे ख़ुद ही मालूम न हो
तब ख़ूब बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल करना
वे शब्द छोटे लोगों को
अक्सर बुद्धू बनाते हैं।

-   ऑर्थर कुड्नर (डेनमार्क)
((सीताकांत महापात्र द्वारा संकलित और नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित पुस्तक कविता...बचपन से। हिन्दी अनुवाद- राजेंद्र प्रसाद मिश्र)